छन्द
विधा : कुण्डलिया
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हरि पर रख विश्वास हिय, पूरे होंगे काज।
भव की बाधा हर हरी, रखें भक्त की लाज॥
रखें भक्त की लाज, पुकारे जब नर मन से।
तत्क्षण प्रभु हों पास, भक्त के इक सुमिरन से॥
नदियाँ दे दें राह, झुका दे सिर भी गिरिवर।
मार्ग न हो अवरुद्ध, भरोसा रख हिय हरि पर॥1॥
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रब पर कर यक़ीन बशर, जिसने रचा जहान।
चल नेकी की राह पर, मत बन तू हैवान॥
मत बन तू हैवान, चार दिन के बाशिन्दे!
उड़ जायेंगे देख, एक दिन सभी परिन्दे॥
नेक बने इंसान, करेंगे प्यार तभी सब।
जिसका दिल फ़ैयाज़, उसे ही चाहे ये रब॥2॥
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बिसरा कर हर भेद को, सदा करें निज कर्म।
अपनायें मिल कर सभी, मानवता का धर्म॥
मानवता का धर्म, हृदय विश्वास जगाये।
सभी मनुज हैं एक, भरोसा हमें दिलाये॥
जीवन मुश्किल आज, न टूटें हम घबरा कर।
भटकें कभी न राह, धर्म अपना बिसरा कर॥3॥
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कुन्तल श्रीवास्तव.
डोंबिवली, महाराष्ट्र.
स्वरचित.
13/02/2025
Labels: कुन्तल श्रीवास्तव

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