छन्द
विधा : छन्द - मनहर, कवित्त या घनाक्षरी छन्द, कुल 31 वर्ण, अंत्य गुरु, शेष गुरु-लघु का कोई नियम नहीं, काव्य की भाषा में ‘मुक्तक’।
चारों चरण समान एवं सम तुकान्त, यति के दो प्रकार—
(1)- 8, 8, 8 एवं 7 पर या (2) - 16 एवं 15 वर्णों पर।
(यति - 8, 8, 8 एवं 7 पर)
🌷🙏🌷
गुरु को नमन कर, चरण वन्दन कर, अर्पित सुमन कर, ज्ञान प्राप्त करिए।
शिष्यों के हैं प्राण गुरु, मान अभिभान गुरु, ज्ञान के निधान गुरु, रिक्त कोष भरिए।
अपना के सत्य धर्म, करिए सदैव कर्म, उन्नति का एक मर्म, श्रेष्ठ मार्ग वरिए।
गुरु जन का संग हो, कलम में तरंग हो, हृदय में उमंग हो, आगे पाँव धरिए। 🌸
(यति - 16 एवं 15 वर्णों पर)
🌷🙏🌷
भोले बाबा विश्वनाथ, शीश गंग चंद्र माथ, सर्प हार कंठ धार मुस्करा रहे कहाँ ?
कण-कण विराज रहे काशी में योगराज, मूढ मति मानव क्यों ढूँढता यहाँ-वहाँ ?
जय हो देवाधिदेव उमापति महादेव, रतिपति कामदेव हुए अनंग यहाँ।
आनन्द उमंग रहे भंग की तरंग रहे, मस्ती भरा रंग रहे हैं बसे शिव जहाँ।
🌸
लिखूँ जब घनाक्षरी, लगे यह अन्त्याक्षरी, प्रिय यह स्वर्णाक्षरी, सदा चलती रहे।
भाव अब चुके नहीं, ये लेखनी रुके नहीं, नयन भी झुके नहीं, रात्रि ढलती रहे।
साहित्य-ज्ञान मन्दर, सत्य सृजन अन्दर, मथ रस-समंदर, अमी फलती रहे।
स्वर सुने हर छन, मनहर घन-घन, चाह करे यही मन, आस पलती रहे।
🌸
कुंतल श्रीवास्तव.
डोंबिवली, महाराष्ट्र.
स्वरचित.
18/02/2025
Labels: जीवन : एक अनुभूति

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home