Saturday, February 22, 2025

कुन्तल श्रीवास्तव


छन्द : अनंग शेखर वृत्त (16 लघु-गुरु)- एक समपाद वर्णिक वृत्त (छंद), प्रति चरण में 32 वर्ण, सभी 32 वर्ण एक निश्चित क्रम में, प्रत्येक चरण में लघु-गुरु की 16 आवृत्तियाँ, चारों चरण एक समान, यति चरणांत में,  चारों तुक समान। (।ऽ। ऽ।ऽ ।ऽ। ऽ।ऽ ।ऽ। ऽ।ऽ ।ऽ। ऽ।ऽ ।ऽ। ऽ।ऽ ।ऽ) 
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प्रभात काल आज धूप है खिली अनूप देखती अकूत रम्य रूप रंग है वसन्त का। 
विहंग गीत गा रहे समेत भृंग-वृंद के सुना रहे सुरम्य गान रम्य दिग्दिगन्त का॥
सखा बने अनंग के प्रसून रंग-रंग के सजा रहे यहाँ सभी उपत्यका अनन्त का। 
अपूर्व कांति का निखार धन्य नैन हैं निहार आज वाटिका विहार है मनोज कन्त का॥1॥
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झड़े समस्त पीत पत्र भाँति-भाँति यत्र-तत्र आज ही धरे धरा पे पाँव हैं रतीश ने। 
अमोघ पुष्प वाण साथ मीनकेतु को किया यहाँ सकोप भस्म साधना रती गिरीश ने। 
कृपालु दृष्टि हो गयी प्रसन्न सृष्टि हो गयी किया सु-स्वागतम्  अदेह का 
दयालु ईश ने। 
बसन्त का हुआ प्रवेश कामदेव को सुना सँदेश दे दिया नवीन वाण है शिरीष ने॥2॥
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बसे समस्त जीव-जन्तु के हिया लुभावनी-सुहावनी अमूर्त रूप कामदेव रागिनी। 
करें अनंग अर्चना बसन्त काल वन्दना सदैव प्रात काल ही समक्ष हंसवाहिनी॥
करें उदीप्त भावना प्र-छन्न प्रेम कामना विकास हेतु सृष्टि के सदैव सद्य तारिणी। 
जगे विशुध्द प्रेम-भक्ति-ज्ञान-योग माँ पराम्बिका! समस्त मूलशक्ति ब्रह्मतत्व धारिणी॥3॥
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कुन्तल श्रीवास्तव.
डोंबिवली, महाराष्ट्र.
स्वरचित.
04/02/2025

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छन्द

विधा : कुण्डलिया 
🌹💖🌹💖🌹

हरि पर रख विश्वास हिय, पूरे होंगे  काज। 
भव की बाधा हर हरी, रखें भक्त की लाज॥ 
रखें भक्त की  लाज, पुकारे जब नर मन से। 
तत्क्षण प्रभु हों पास, भक्त के इक सुमिरन से॥
नदियाँ  दे दें राह, झुका दे  सिर भी  गिरिवर। 
मार्ग न हो अवरुद्ध, भरोसा रख हिय हरि पर॥1॥
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रब पर कर यक़ीन बशर, जिसने रचा जहान।
चल  नेकी की  राह पर, मत बन  तू  हैवान॥
मत बन  तू  हैवान, चार दिन के बाशिन्दे! 
उड़  जायेंगे  देख, एक दिन सभी  परिन्दे॥
नेक  बने  इंसान, करेंगे  प्यार  तभी  सब।  
जिसका दिल फ़ैयाज़, उसे ही चाहे ये रब॥2॥
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बिसरा कर हर भेद को, सदा करें निज कर्म।
अपनायें मिल कर सभी, मानवता का धर्म॥
मानवता  का  धर्म, हृदय  विश्वास  जगाये। 
सभी  मनुज हैं एक, भरोसा  हमें दिलाये॥
जीवन मुश्किल आज, न टूटें हम घबरा कर। 
भटकें कभी न राह, धर्म अपना बिसरा कर॥3॥
🌸

कुन्तल श्रीवास्तव. 
डोंबिवली, महाराष्ट्र. 
स्वरचित. 
13/02/2025

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छन्द

विधा : छन्द - मनहर, कवित्त या घनाक्षरी छन्द, कुल 31 वर्ण, अंत्य गुरु, शेष गुरु-लघु का कोई नियम नहीं, काव्य की भाषा में ‘मुक्तक’। 
चारों चरण समान एवं सम तुकान्त, यति के दो प्रकार—
(1)-  8, 8, 8 एवं 7 पर या  (2) - 16 एवं 15 वर्णों पर।

(यति - 8, 8, 8 एवं 7 पर)
🌷🙏🌷
गुरु  को नमन कर, चरण वन्दन कर, अर्पित सुमन कर, ज्ञान प्राप्त करिए। 
शिष्यों के हैं प्राण गुरु,  मान अभिभान गुरु, ज्ञान के निधान गुरु, रिक्त कोष भरिए। 
अपना के सत्य धर्म, करिए सदैव कर्म, उन्नति का एक मर्म, श्रेष्ठ मार्ग वरिए। 
गुरु जन का संग हो, कलम में तरंग हो, हृदय में उमंग हो,  आगे पाँव धरिए। 🌸

(यति - 16 एवं 15 वर्णों पर) 
🌷🙏🌷
भोले बाबा विश्वनाथ, शीश गंग चंद्र माथ, सर्प हार कंठ धार मुस्करा रहे कहाँ ? 
कण-कण विराज रहे काशी में योगराज, मूढ मति मानव क्यों ढूँढता यहाँ-वहाँ ? 
जय हो देवाधिदेव उमापति महादेव, रतिपति कामदेव हुए अनंग यहाँ। 
आनन्द उमंग रहे भंग की तरंग रहे, मस्ती भरा रंग रहे  हैं बसे शिव जहाँ। 
🌸

लिखूँ जब घनाक्षरी, लगे यह अन्त्याक्षरी, प्रिय यह स्वर्णाक्षरी, सदा चलती रहे। 
भाव अब चुके नहीं, ये लेखनी रुके नहीं, नयन भी झुके नहीं, रात्रि ढलती रहे। 
साहित्य-ज्ञान मन्दर, सत्य सृजन अन्दर, मथ रस-समंदर, अमी फलती  रहे।
स्वर सुने हर छन, मनहर घन-घन, चाह करे यही मन, आस पलती रहे। 
🌸

कुंतल श्रीवास्तव. 
डोंबिवली, महाराष्ट्र. 
स्वरचित. 
18/02/2025

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जीवन : एक अनुभूति

'जीवन एक अनुभूति' ब्लॉग को मैंने अभी लिखना शुरू ही किया कि अपनों से मिलने वाली शुभ कामनाओं और उनके प्यार से में अभिभूत हो गयी हूँ। मैंने इस ब्लॉग को लिखने का निर्णय किया है परन्तु मेरे अन्दर जो कुछ है उसे मैं कैसे एक आकार दूँगी इसे मैं अभी समझ नहीं पायी हूँ।
मेरे हाथ में आज कलम नहीं है, एक कीबोर्ड है जिसे मैंने अभी कुछ दिनों पूर्व ही चलाना सीखा है। कंप्यूटर का उपयोग इसके पूर्व मैंने केवल गेम खेलने के लिए ही किया था और इन्टरनेट का प्रयोग बच्चों से बात करने के लिए। आज मुझे अभिव्यक्ति के एक सशक्त मध्यम के रूप में गूगल का यह उपहार मिला है। मैं अभिव्यक्ति के इस नवीन मध्यम को पा कर बहुत उत्साहित हूँ।
न जाने कितने सालों पूर्व मैंने लिखना छोड़ दिया था पर अब मैं फिर से कुछ लिखना चाहती हूँ। मैं अपनी बातें अपने पाठकों को बताना और उनकी बातें सुनना, जानना चाहती हूँ। एक समय था जब हर पल एक ही धुन लगी रहती थी कि कुछ नया लिखना है...कुछ नयी बातें अपने पाठकों से करनी है...कुछ नए प्रगतिशील विचार अपने पाठकों के सामने लानी हैं। दिनभर उठते-बैठते, सोते-जागते एक ही धुन लगी रहती थी...कुछ नया काम, कुछ नयी रचनाएँ , कुछ नया सृजन...बस कुछ नया...! हाथ में एक लेखनी थी, अभिव्यक्ति का एक माध्यम- समाचार पत्र था। और क्या चाहिए एक रचनाकार और सृजनशील मानस को?
पर हर व्यक्ति को उसका मनचाहा सब-कुछ नहीं मिल सकता। अभिव्यक्ति का जो माध्यम हाथ में था वह अविश्वसनीय रूपसे छीन लिया गया। लिखने की इच्छा ही समाप्त हो गयी थी। पर आज बरसों बाद, अपने देश से इतनी दूर...अमेरिका के एक छोटे से शहर में, मैं रचना की प्रक्रिया से पुनः जुड़ गयी हूँ। मैं चकित तो हूँ पर बहुत खुश भी हूँ।
अपने छोटे बेटे प्रवीण के एक प्रयास से मैं, अपनी नन्हीं-सी प्यारी पोती दिवा के लिए, फिर से जी उठी हूँ। दिवा के साथ मैं सबसे बातें कर सकूँ, सबके साथ अपने जीवन के कुछ पल बाँट सकुनौर आप सबके प्यार, विश्वास के साथ कुछ नया कर सकूँ - यही मैं ईश्वर से कामना करती हूँ।

Tuesday, July 28, 2009

जीवन:एक अनुभूति

ब्लॉग में मैं अपने और अपने अनुभवों के बारे में काफी कुछ लिखना और अपने अनुभव सबके साथ बाँटना चाहती हूँ। गूगल ने मुझे एक मौका दिया है, जिससे इस ब्लॉग द्वारा मैं अपने जीवन के कुछ अविस्मरणीय पल सबके साथ बाँट सकती हूँ। मैं इसके लिए मन से गूगल के प्रति आभारी हूँ।
जीवन मनुष्य को ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अनमोल वरदान है या यूँ कहूँ कि मानव-जीवन प्रकृति की एक अनूठी रचना है। मनष्य का जीवन ईश्वर का वरदान है या प्रकृति का उपहार-पर यह है अद्वितीय !

हर व्यक्ति का जीवन दूसरे से भिन्न है; उसका व्यक्तित्व, उसका विचार, उसका अनुभव; सब कुछ दूसरे व्यक्ति से अलग है। जीवन का यह अनोखापन ही शायद हर व्यक्ति को जिज्ञासु प्रवृत्ति प्रदान करता है। उसमें 'और अधिक' जानने की ललक पैदा करता है। मानव-जीवन की यही विभिन्नता उसके जीवन में रस का संचार करती है और उसे जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से परिचित कराती है।

हर व्यक्ति की तरह मेरा भी अपना एक जीवन है जिसे मैंने सबके साथ मिल कर पूरी तरह जिया है। कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हैं जिन्हें मैं सबके साथ मिल कर बाँटना और एक नया अनुभव करना चाहती हूँ। मेरे इस ब्लॉग में आप सबका स्वागत है।

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Monday, July 27, 2009

श्री गणेश जी

श्री गणेशाय नमः

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